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Showing posts from February, 2013

जज़्बा-ए-मुख़्तार

Tuesday, 26 February 2013 ---------------------  "लोगो की तमन्नाओं का यूँ तो कोई ठिकाना नहीं,   हमको नहीं है गिला के हमको अब और कुछ पाना नहीं।   तरस उन पर आता है जो समझते है हमको नाकाबिल,   क्यूँकि अब तलक इस ज़माने ने जज़्बा-ए-मुख़्तार को जाना नहीं।" ---------------------------------------------------- -Alok Dixit 'मुख़्तार'

जज़्बा-ए-मुख़्तार

Tuesday, 26 February 2013 -----------------------------------------  "लोगो की तमन्नाओं का यूँ तो कोई ठिकाना नहीं,   हमको नहीं है गिला के हमको अब और कुछ पाना नहीं।   तरस उन पर आता है जो समझते है हमको नाकाबिल,   क्यूँकि अब तलक इस ज़माने ने जज़्बा-ए-मुख़्तार को जाना नहीं।" ------------------------------------------------------------------------ -Alok Dixit 'मुख़्तार'   

शायरी..

"एक अर्सा बीत गया हमको किये उनके एक लम्हे की गुज़ारिश, हम यूँ ही भीग रहे है तन्हा क्यूँकि बिना उनके तो है सिर्फ मेरे अश्कों की बारिश।" -Alok Dixit 'मुख़्तार' "सूरतों पर कहाँ लिखा होता है सीरतों का हाल,   ग़र  लिखा होता तो हम भी पढ़ लेते उनकी बेवफाई को।" -Alok Dixit 'मुख़्तार'    

वो फीकी शाम...

"लबों पर तैर गयी मुस्कराहट जैसे ही हुआ महफ़िल में तेरा ज़िक्र,   झूठ कहते रहे यूँही सबसे के हमको नहीं है तेरी कोई फिक्र।   रात भर मैकदे में छलकते रहे दौर-ए-जाम,   पर आपकी कमी हमको खलती रही और बहुत फीकी गुजरी वो शाम।" -Alok Dixit 'मुख़्तार'