"तेरे ख्यालों में ग़ाफ़िल ज़माने से बे-ज़ार हो कर, तेरे इंतज़ार में बैठा है कोई मरने को तैयार हो कर। हसरत-ए-इश्क़ में मुख़्तार तेरा अब और क्या मुक़ाम होगा, मुक्कमल ना हुई जो तेरी आरज़ू तो शायद मौत ही अंजाम होगा। फ़क़त तब बस इतने से ख़ुशी और इतने से आराम होगा, इस गुमनाम सी मोहब्बत में मेरा शायद तब थोड़ा नाम होगा। Alok Dixit 'मुख़्तार'
दोस्तों ये ब्लॉग मेरी लिखी हुई शायरी और नज़्मों का एक संग्रह है। मैं मुख़्तार के नाम से अपनी शायरी लिखता हूँ, यहाँ इस ब्लॉग पर मेरी लिखी हुई शायरी है आप सभी पढ़े और ग़र अच्छी लगे तो हौसला बढ़ाये और कुछ कमी हो तो इत्तला जरूर करे। आपका Alok Dixit 'मुख़्तार'