"भँवरों का फूलों पर मंडराना ग़र रोज़ का काम नहीं होता, तो खिलना यूँ बागों में कलियों का हर सुबह आम नहीं होता। ग़र आज ये गुलज़ार हैं तो शुक्र हैं उन भँवरों का, जिनका इनके फ़ेहरिस्त-ए-बिस्मिल में कभी नाम नहीं होता।" -Alok Dixit 'मुख़्तार'
दोस्तों ये ब्लॉग मेरी लिखी हुई शायरी और नज़्मों का एक संग्रह है। मैं मुख़्तार के नाम से अपनी शायरी लिखता हूँ, यहाँ इस ब्लॉग पर मेरी लिखी हुई शायरी है आप सभी पढ़े और ग़र अच्छी लगे तो हौसला बढ़ाये और कुछ कमी हो तो इत्तला जरूर करे। आपका Alok Dixit 'मुख़्तार'