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Showing posts from June, 2014

अपने - बेगाने....

-----------------------Friday, 6 June 2014 "इस अपनों की भीड़ में है सैकड़ो बेगाने, सब शक्लो से वाकिफ है और दिलों से अनजाने। कैसे कह सकता है कोई के वो है हमको पहचानता, जबकि अपने अंदर बैठे इंसान को भी नहीं है वो जानता। सब है अजनबी एक दूसरे से और यूँ ही रहे तो अच्छा, क्यूंकि अपना बन जाने से रिश्तों पर उम्मीदों का बोझ आ जाता है।" ---------------------------------------------- -Alok Dixit 'मुख़्तार'