-----------------------Friday, 6 June 2014 "इस अपनों की भीड़ में है सैकड़ो बेगाने, सब शक्लो से वाकिफ है और दिलों से अनजाने। कैसे कह सकता है कोई के वो है हमको पहचानता, जबकि अपने अंदर बैठे इंसान को भी नहीं है वो जानता। सब है अजनबी एक दूसरे से और यूँ ही रहे तो अच्छा, क्यूंकि अपना बन जाने से रिश्तों पर उम्मीदों का बोझ आ जाता है।" ---------------------------------------------- -Alok Dixit 'मुख़्तार'
दोस्तों ये ब्लॉग मेरी लिखी हुई शायरी और नज़्मों का एक संग्रह है। मैं मुख़्तार के नाम से अपनी शायरी लिखता हूँ, यहाँ इस ब्लॉग पर मेरी लिखी हुई शायरी है आप सभी पढ़े और ग़र अच्छी लगे तो हौसला बढ़ाये और कुछ कमी हो तो इत्तला जरूर करे। आपका Alok Dixit 'मुख़्तार'