"चलो आज फिर किसी पुरानी नज़्म को गुनगुनाया जाए , जो है महरूम ज़माने की ख़ुशी से आज फिर उनको हँसाया जाए । वज़ह जो बनी है इस ख़ुशी की आज उस वज़ह से ज़माने को मिलाया जाए , पिरो के उनकी यादों को लफ्ज़ों में आज फिर सीने से लगाया जाए, दरमियान-ए-दिल है कितनी मोहब्बत इस दास्ताँ को आज इस महफ़िल में सुनाया जाए। चलो आज फिर किसी पुरानी नज़्म को गुनगुनाया जाए। लोग कहते है मुख़्तार से नहीं है ये मोहब्बत आसान, चलो इस बहाने ही सही आज अपने जज़्बा-ए -मोहब्बत को आज़माया जाए।" -Alok Dixit 'मुख़्तार'
दोस्तों ये ब्लॉग मेरी लिखी हुई शायरी और नज़्मों का एक संग्रह है। मैं मुख़्तार के नाम से अपनी शायरी लिखता हूँ, यहाँ इस ब्लॉग पर मेरी लिखी हुई शायरी है आप सभी पढ़े और ग़र अच्छी लगे तो हौसला बढ़ाये और कुछ कमी हो तो इत्तला जरूर करे। आपका Alok Dixit 'मुख़्तार'