Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2014

जज़्बा-ए -मोहब्बत...

  "चलो आज फिर किसी पुरानी नज़्म को गुनगुनाया  जाए ,   जो है महरूम ज़माने की ख़ुशी से आज फिर उनको हँसाया  जाए ।    वज़ह जो बनी है इस ख़ुशी की आज उस वज़ह  से ज़माने को मिलाया  जाए ,   पिरो के उनकी यादों को लफ्ज़ों में आज फिर सीने से लगाया जाए,      दरमियान-ए-दिल है कितनी मोहब्बत इस दास्ताँ को आज इस महफ़िल में  सुनाया जाए।    चलो आज फिर किसी पुरानी नज़्म को गुनगुनाया जाए।   लोग कहते है मुख़्तार से नहीं है ये मोहब्बत आसान,   चलो इस बहाने ही सही आज अपने जज़्बा-ए -मोहब्बत को आज़माया जाए।" -Alok Dixit 'मुख़्तार'