"तेरे ख्यालों में ग़ाफ़िल ज़माने से बे-ज़ार हो कर,
तेरे इंतज़ार में बैठा है कोई मरने को तैयार हो कर।
हसरत-ए-इश्क़ में मुख़्तार तेरा अब और क्या मुक़ाम होगा,
मुक्कमल ना हुई जो तेरी आरज़ू तो शायद मौत ही अंजाम होगा।
फ़क़त तब बस इतने से ख़ुशी और इतने से आराम होगा,
इस गुमनाम सी मोहब्बत में मेरा शायद तब थोड़ा नाम होगा।
Alok Dixit 'मुख़्तार'

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