"बहुत बदलना पड़ेगा ख़ुद को तेरे पैमानों के मुताबिक़,
सोचता हूँ के तुझे पाने का ख्याल ही बदल देता हूँ।
किसी एक इंसान को पाना इतना भी नहीं है जरुरी,
जिसके चलते अपनी ही शख्सियत से बन जाए दूरी।
मैं मुक़्क़म्मल हूँ क्यूंकि मुझे उस अज़ीम खुदा ने बनाया है,
यह मोहब्बत की जरुरत का इल्म तो इस ज़माने ने जगाया है।
गर ताल्लुकात मुफीद हो तो रिश्ते भी है और जज्बात के नाते भी,
मैंने देखा है लोगो को अपनी जरुरत की चलते सजदे में सर झुकाते भी।
यहाँ कोई किसी का हमसफ़र नहीं ना किसी को किसी का इंतज़ार,
एक दरियाँ सी है ये ज़िन्दगी और सबको जाना है उस पार।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'

nice.....
ReplyDeleteHum b kbi praye na hote, jo ye rishte humne apnaye na hote, jaise main tha sbka sab mere bhi hote, agar maine vo sab azmaye na hote.
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