बाते जितनी भी थी हमने उनसे कही,
कुछ वो समझे नहीं कुछ वो माने नहीं।
मेरी खुशियों की थे वो वज़ह बन गए,
दिल ने माना नहीं मैंने जाना नहीं।
महफ़िल से हुए थे रुखसत जो वो,
वो रुके भी नहीं मैंने रोका नहीं।
चंद क़दमों को चल के जो वो थे थम गए,
वो मुड़े भी नहीं ना मैंने आवाज़ दी।
इज़हार और इंकार की कश्मक़श में मैं उलझा रहा,
खामोश ही रहा और उनसे कुछ ना कहा।
और कुछ इस तरह से वो मुझसे जुदा हो गए,
जाते जाते वो मेरी मोहब्बत मेरे खुदा हो गए।
कुछ वो समझे नहीं कुछ वो माने नहीं।
मेरी खुशियों की थे वो वज़ह बन गए,
दिल ने माना नहीं मैंने जाना नहीं।
महफ़िल से हुए थे रुखसत जो वो,
वो रुके भी नहीं मैंने रोका नहीं।
चंद क़दमों को चल के जो वो थे थम गए,
वो मुड़े भी नहीं ना मैंने आवाज़ दी।
इज़हार और इंकार की कश्मक़श में मैं उलझा रहा,
खामोश ही रहा और उनसे कुछ ना कहा।
और कुछ इस तरह से वो मुझसे जुदा हो गए,
जाते जाते वो मेरी मोहब्बत मेरे खुदा हो गए।
- Alok Dixit 'मुख़्तार'
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