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My Poetry - 1

मेरा शायरी संग्रह

A collection of my poetry


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"थक गया हूँ अब तो तनहा जीते जीते,
ऐ जिंदगी अब तुझसे नाता तोड़ लेता हूँ।" 
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"मेरी ये ज़िन्दगी सनम एक रेशम की डोर है,
जिसका मैं भी एक छोर हूँ और तू भी एक छोर है।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"तुम हुए ना मुतास्सिर जिस सफर मैं साथ चल के इतना,
उसकी मंज़िल को पाने मैं अब क्या ख़ाक मज़ा आएगा।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'

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"क्यों करते हो उम्मीद वफ़ा की मुख़्तार इस बेवफाई के दौर मैं,
यहाँ मतलब निकल जाने पर लोग ढूंढ लेते है अपना खुद भी किसी और मैं।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"तुमने बेवफाई तो की पर अब ज़रा संभल के रहना मेरे यार,
क्योंकि जब मोहबत्त की थी बेइंतेहा तो नफरत भी सनम बेइंतेहा ही होगी।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"बड़ी ही तयशुदा उम्र है मेरे खाव्बो की,
ये रातों को शुरू और सुबह को ख़त्म हो जाते है।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"तुझे पाने की ज़िद करना मेरे ऊपर है, 
पर तेरा मिलना तो मुमकिन तेरी रज़ा से ही होगा।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"ना तो उम्मीद कर किसी से और ना ही किसी की रज़ा ले,
तू बस अपने तरीके से जिये जा और अपनी ज़िन्दगी का मज़ा ले।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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Comments

  1. Waah re zindagi tu bhi kya khel rachati hai, 
    Kabi apno ko begana kabi begano ko apna bnati hai, 
    Khuda bhi jane kyun hai deewana is zindagi ka, 
    Jo ek din sabse bewafa ho jaati hai.

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Shukriya

क्या कहूँ मैं तुझे क्या लिखूँ  मैं तुझे, कौनसी बात से ये कहूँ मैं तुझे, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मेरी ज़िंदगी मैं आने का, इसको हसीं बनाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ दिल में  मेरे बस जाने का, धड़कन मेरी बन जाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मुझको यूँ हसाने का, सताने का रुलाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मुझे इतना ख़ास बनाने का, दिल में तेरे सजाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ -Alok Dixit  'मुख़्तार'

Love - Pure & Divine

"The day you will think of me,  the day you will think of us.  The day you will live for me,  the day you will breathe for us.  I will be yours & you will be mine,  It will be love pure & divine."       -Alok Dixit 'मुख़्तार'        28/01/2009

Love, is it needed??

"बहुत बदलना पड़ेगा ख़ुद को तेरे पैमानों के मुताबिक़ ,  सोचता हूँ के तुझे पाने का ख्याल ही बदल देता हूँ। किसी एक इंसान को पाना इतना भी नहीं है जरुरी , जिसके चलते अपनी ही शख्सियत से बन जाए दूरी। मैं मुक़्क़म्मल हूँ क्यूंकि मुझे उस अज़ीम खुदा ने बनाया है , यह मोहब्बत की जरुरत का इल्म तो इस ज़माने ने जगाया है। गर ताल्लुकात मुफीद हो तो रिश्ते भी है और जज्बात के नाते भी , मैंने देखा है लोगो को अपनी जरुरत की चलते सजदे में सर झुकाते भी। यहाँ कोई किसी का हमसफ़र नहीं ना किसी को किसी का इंतज़ार , एक दरियाँ सी है ये ज़िन्दगी और सबको जाना है उस पार।" -Alok Dixit ' मुख़्तार'