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My Poetry-2


मेरा शायरी संग्रह - 2

A Collection of my Poetry - 2


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“वो मेरी जिंदगी की हकीकत है पर उसको मुझ पे ऐतबार नहीं, 
शायद इसलिए हर दफा मेरी लकीरो में वो अपना वजूद ढूंढती है।“
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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“मोहब्बत की जिरह मे हर दफा अपने महबूब को सच्चाई का सबूत देता हूँ,
कभी कभी तो लगता है ज़नाब आशिक़ी नहीं की बल्कि कोई मुकदमा लड़ रहा हुँ।“
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"जीना है जिंदगी को तो जियो एक इत्तिफाक की तरह,
ग़र दस्तूर से जिए इसको 'मुख़्तार' तो जीने में मज़ा थोड़ा कम आएगा।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"गुरूर ना कर ऐ बादल आज जो तू आफताब पे है, 
तेरी भी किस्मत का मुक्कम्मल जमीं से मिल कर ही होगा।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"क्या शिकायत करूँ तुझसे क्या तुझसे गिला करूँ,
भला अपनी धड़कनो से भी कभी कोई नाराज़ होता है।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"दिल से लबों तक की लंबी दूरी मैं सफर कर के आया हूँ,
एक उम्र तजुर्बों की जीने के बाद मैं अपने जज्बात अपने लबों पे लाया हूँ।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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"बेबस है गर समंदर तो इसमें उसका ही कसूर है,
फ़ितरत से खारा है इसलिए सबसे दूर है।"
-Alok Dixit 'मुख़्तार'
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Shukriya

क्या कहूँ मैं तुझे क्या लिखूँ  मैं तुझे, कौनसी बात से ये कहूँ मैं तुझे, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मेरी ज़िंदगी मैं आने का, इसको हसीं बनाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ दिल में  मेरे बस जाने का, धड़कन मेरी बन जाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मुझको यूँ हसाने का, सताने का रुलाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ मुझे इतना ख़ास बनाने का, दिल में तेरे सजाने का, शुक्रिया है तुझे शुक्रिया - २ -Alok Dixit  'मुख़्तार'

Love - Pure & Divine

"The day you will think of me,  the day you will think of us.  The day you will live for me,  the day you will breathe for us.  I will be yours & you will be mine,  It will be love pure & divine."       -Alok Dixit 'मुख़्तार'        28/01/2009

Love, is it needed??

"बहुत बदलना पड़ेगा ख़ुद को तेरे पैमानों के मुताबिक़ ,  सोचता हूँ के तुझे पाने का ख्याल ही बदल देता हूँ। किसी एक इंसान को पाना इतना भी नहीं है जरुरी , जिसके चलते अपनी ही शख्सियत से बन जाए दूरी। मैं मुक़्क़म्मल हूँ क्यूंकि मुझे उस अज़ीम खुदा ने बनाया है , यह मोहब्बत की जरुरत का इल्म तो इस ज़माने ने जगाया है। गर ताल्लुकात मुफीद हो तो रिश्ते भी है और जज्बात के नाते भी , मैंने देखा है लोगो को अपनी जरुरत की चलते सजदे में सर झुकाते भी। यहाँ कोई किसी का हमसफ़र नहीं ना किसी को किसी का इंतज़ार , एक दरियाँ सी है ये ज़िन्दगी और सबको जाना है उस पार।" -Alok Dixit ' मुख़्तार'