बहुत मुश्किल बाहर से हँसना और अंदर से रोना।
खूबसूरत नज़्म लिखता हूँ मैं इस ज़माने को सुनाने को,
जिससे कुछ तो मिले लोगो को अपना दिल बहलाने को।
ये प्यार इश्क़ और मोहब्बत सब फ़िज़ूल की है बाते,
पर जो इन से किनारा कर लिए तो कैसे गुजरेंगी राते।
कलम मेरी ये क्या लिखेगी ग़र लिखने को कोई फ़साना ना हो,
किसको सुनाऊंगा मैं अपनी गजलें ग़र मोहब्बत में ग़ाफ़िल ये ज़माना ना हो।"
Alok Dixit 'मुख़्तार'

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